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Friday, 31 January 2020

लड़खड़ाती वफ़ादारी ( लघुकथा )





लड़खड़ाती वफ़ादारी ( लघुकथा )



                  रात्रि का पहर! झुमरू ज़मींदार साहब की चौखट पर मुँह बाये घंटों से खड़ा था। बीच-बीच में थोड़ा सुस्ताने हेतु गोल-गोल घूमकर पूँछ हिलाते हुए बैठ जाया करता और कभी-कभी भीतर से आती आवाज़ को सुनकर चौकन्ना हो एक चुस्त-दुरुस्त चौकीदार की भाँति खड़ा हो जाता। दो बरस पहले झुमरू की माँ उसे जन्म देते वक़्त यहीं ज़मींदार की गौशाला में ही गुज़र गयी।  तब से झुमरू ज़मींदार साहब के टुकड़ों पर पल रहा है और अपनी वफ़ादारी निभाता चला आ रहा है।

"क्या हुआ?"
"अरे खाना तो पूरा खा लेते!"
"भोजन पर काहे ग़ुस्सा उतार रहे हो?"
"अरे, ऊ छितना की घरवाली गवाही दे दीस कोरट मा तो का हो गवा!"
"अभी सज़ा तो न हुई ना तुमका!"
"भेज दो, दो-चार लठैत रात मा!"
"सारी हेकड़ी निकल जाएगी उस छितना की मेहरिया की, दो मिनट में!"

ठकुराइन अपने ज़मींदार पति राणा जी को सलाह देती हुई समझाती है।

"अरे, का बतायें!"
"लाख समझाया था उन ससुरों को!"
"मुँह तोप के हमला करना!"
"और केवल धमकाना ऊ छितना को!"
"मुझे का पता था कि ई ससुर भीमा और बजरंगिया उसे जान से ही मार देंगे!"
"औरो उसके घरवाली के ही सामने!"

कहते हुए राणा जी हाथ में तम्बाकू मलते-मलते चूने के गर्दे को दोनों हाथों से ठोककर हवा में उड़ाते हैं।

"अरे जी!"
"तुम नाहक़ ही चिंता करते हो।"
"घर में दस-ठो कुत्तों को किस दिन के लिये पाल रखा है?"
"छोड़ देना आज रात उसकी घरवाली पर।"
"सारी अक़्ल ठिकाने आ जायेगी!"
अपनी ज़मींदारी का रौब झाड़ती हुई ठकुराइन पलँग से उठकर खड़ी हो जाती है, और भीतर से ही अपने नौकर बजरंगी को आवाज़ लगाने लगती है।

ठकुराइन की गरजती हुई आवाज़ सुनकर झुमरू चौकन्ना होकर खड़ा हो जाता है और बेतहाशा भौंकने लगता है, मानो कह रहा हो-
"मालिक आप यह अन्याय करने जा रहे हैं, छितना के परिवार के साथ!"
"और मैं यह घोर अन्याय बिल्कुल नहीं होने दूँगा।"
तभी झुमरू की पीठ पर एक ज़ोर की लाठी उसके सम्पूर्ण क्रांतिकारी विचारों को एक करुणाभरी चीख़ में परिवर्तित कर देती है!

"अरे का हुआ!"
"कउन है रे!"
ठकुराइन भीतर से ही आवाज़ लगाती हुई पूछती है।

"अरे मालकिन हम हैं।"
"बजरंगिया!"
"ई ससुर तोहार कुकुरा झुमरूआ  बौरा-बौराकर हम पर भौंके जा रहा था।"
"दिया दुइ लाठी ससुर को!"

"अरे काहे भगा दिया उसे?"
"रोटी ख़ातिर खड़ा रहा होगा!"
"उसके रोज़ का टेम हो गया था ना!"

कहती हुई ठकुराइन पलँग पर अपने दोनों पाँव पसारकर अपना पानवाला ख़ानदानी संदूक खोलने लगती है।      


'एकलव्य' 
कोरट =न्यायालय/कोर्ट/अदालत
मेहरिया =पत्नी 
टेम = समय/टाइम  
कुकुरा =कुत्ता         
                     

Monday, 27 January 2020

अम्मा गिर गई! ( लघुकथा )






अम्मा गिर गई! ( लघुकथा ) 



रोज़-रोज़ की किच-किच! मैं तो थक गया हूँ इस घर से, कहते हुए वक़ील साहब कचहरी जाने के लिए तैयार होते हुए।
लाजवंती मुँह फुलाए वक़ील साहब को उलाहना देती हुई।

लाजवंती-
"हाँ जी!"
"मैं ही सबसे बुरी हूँ!"
"बाक़ी सभी दूध के धुले हैं!"

कहते-कहते रोने लगती है।
"पहले इस आदमी ( वक़ील साहब की ओर इशारा करती हुई ) से कभी कोई सुख नहीं मिला!"
"और अब ये नई बहुरिया के अपने ही ठाट-बाट!"
"जब देखो तब महारानी एलिज़ाबेथ, टाँग पसारे चारपाई तोड़ती रहती है!"
"और मैं मुई"
"इस कड़कड़ाती ठंड में घर का झाड़ू-पौंछा कर-करके मरी जा रही हूँ!"
"और मेरा सुपुत्र रामखेलावन अपने ही खेला में दिन-दोगुनी,रात पॉँच गुनी करने में मस्त है!"
"मेरे तो भाग ही फूट गए!"
"अरे किरीतिया!"
"कब ठीक होगी रे तू?"

         वक़ील साहब की बहुरिया 'किरीतिया' चार दिन से मलेरिया के बुख़ार से पीड़ित थी, नहीं तो घर का सारा काम-धाम उसी के सर पर फूटता था।
जबसे किरीतिया खटिया पर पड़ी है, लाजवंती के मुँह पर बारह ही बजे रहते हैं, और काम कम उसका सारा समय किरीतिया को ताने देने में ही गुज़र जाता है।

          खैर, किसी तरह रोज़ के चूल्हा-चौके का काम निपटाकर लाजवंती सीढ़ियों से उतर रही थी कि उसका पाँव फिसल गया!
भारी ढुलमुल शरीर होने की वज़ह से वह स्वयं को संभाल न सकी और कई करवटें लेती हुई प्रारम्भ से अंतिम सीढ़ी के फ़र्श पर आ पसरी, और ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाना शुरु कर दिया!

                              वक़ील साहब लाजवंती के इस करुण पुकार को सुनकर उल्टे पाँव दौड़े, और उधर किरीतिया बुख़ार होते हुए भी जैसे-तैसे लाजवंती को उठाने पहुँच गयी!
किसी तरह मिल-मिलाकर दोनों ने लाजवंती को उसके बिस्तर तक पहुँचाया।

       लाजवंती को दिन में ही चाँद-तारों के दर्शन होने लगे थे! किरीतिया लाजवंती के सर पर अपना हाथ फेरने लगी जो बुख़ार होने की वज़ह से अत्यंत गर्म था!

किरीतिया- माँ जी!
"अब कैसी तबीयत है?"
लाजवंती से कहती हुई।

         परन्तु लाजवंती दर्द के कारण बोलने में अक्षम थी सो धीरे से अपनी पलकें झपका दी। संभवतः लाजवंती के हड्डी में चोट लगी थी यह भाँपते हुए किरीतिया शीघ्र ही रसोईंघर की ओर भागी और हल्दीवाला दूध बनाकर ले आयी, और लाजवंती को इसे पीने के लिए कहने लगी। परन्तु आज लाजवंती को अपने किये गए कर्मों पर पछतावा हो रहा था।
मौन ही वह किरीतिया को देखे जा रही थी और पश्चाताप के अश्रु उसकी आँखों से स्वतः ही गतिमान थे! 

           
                   

'एकलव्य' 

Sunday, 19 January 2020

नौटंकी ( लघुकथा )







    नौटंकी ( लघुकथा )

वाराणसी शहर अपने अल्हड़-मस्ती और मस्तानों की एक से बढ़कर एक टोली हेतु मशहूर, और बात करें लंका स्थित पनवड़िया बनारसी पानवाले के पान की दुकान की तो क्या बात ! 

          संसद में जितने सत्र होते हैं वर्ष में, उसमें सभी माननीय उपस्थित हों यह आवश्यक नहीं परन्तु पनवड़िया बनारसी के पान की दुकान पर वर्षभर सत्र का आयोजन कोई आम बात नहीं और वो भी शहरभर के धुरंधर ज्ञानी 'मनई' का जमावड़ा! 
पनवड़िया बनारसी और उसकी दुकान में ज़ोर-ज़ोर से बजता सुपरहिट भोजपुरी चलचित्रों का मनलुभावन देशी अपनत्व और कुछ पाश्चात्य की अश्लीलता से सराबोर पॉप टाइप आधुनिक संगीत! 

सुबह का समय, पंडित फुदकूराम जी का आगमन -
पंडित फुदकू राम बड़े ही रौब से ऐंठते हुए-
"अरे बनारसी!"
"थोड़ा चकाचक पान तो लगा!"
पनवड़िया बनारसी पान लगाने में मस्त।
"अरे पंडित जी प्रणाम!"
"का हाल-चाल बा ?"
 उधर से विद्याधर द्विवेदी बड़ी ही शालीनता से बोले। 

पंडित फुदकूराम नाक-भौं सिकोड़ते हुए प्रतिउत्तर में अपने पान के दागों से रंगे दाँत विद्याधर द्विवेदी को दिखा दिये!
विद्याधर द्विवेदी बड़े ही चुटीले अंदाज में-
"पंडित जी कछु सुना ?"

पंडित फुदकूराम  तनिक ऐंठते हुए-
"सुन ही तो रहे हैं!"
"अउर का मूँगफली थोड़े न तोड़ रहे हैं!"
विद्याधर द्विवेदी, पंडित फुदकूराम के इस व्यंग्यात्मक प्रतिक्रिया से अपनेआप को थोड़ा असहज महसूस करने लगे।
पंडित फुदकूराम थोड़ा नरम पड़ते हुए-
"अब नया का हो गवा ?"

विद्याधर द्विवेदी उत्सुकतापूर्वक-
"अरे!"
"सबरीमला का कांड सुने की नाही ?"

पंडित फुदकूराम कुंठाभरी प्रतिक्रिया देते हुए-
"औरो का सुने!"
"घर-बार के कांड से फुर्सत मिले तब ना!"
"ख़ैर छोड़िए!"
"क्या रखा है देश-दुनिया की ख़बरों में ?"
"यहाँ तो कुलहिन भ्रष्टाचारी हैं!"
"केके देखें ?"
"कउनो कुछ कहते भी नहीं!"
"सभी के मुँह जो सिले हैं!"

"अबही हाल ही की एक घटना ले लीजिए!"
"गाँव में शौचालय बनाने का पैसा ब्लॉक का प्रमुख अउर ग्रामप्रधान दोनों सठगठिया भाई मिलकर गपत कर गये!"
"सरकारी कागज़ में शौचालय निर्मित!"
"अउरो ससुर धरती पर नदारद!"
"अउर तो अउर सड़क पर पुलिसवालों की दादागीरी अलगे चल रही है!"

"भारी वाहनों के प्रवेश हेतु वर्जित सड़क पर हमारे रक्षक खाली बीस-ठो रुपल्ली खातिर रात में भारी सामान से भरे ट्रकों को बिना किसी रोक-टोक के आने-जाने की सहर्ष अनुमति प्रदान करते हैं!"
"अउर का देखें ?"
"सभी तो देख ही रहे हैं परन्तु सभी ने बाबा विश्वनाथ की कछु न बोलने की कसम ले रखी है!"

      तभी सड़क के दूसरी ओर से ज़ोर-ज़ोर किसी के रोने-गिड़गिड़ाने की आवाज़ सुनाई पड़ने लगी!
पनवड़िया बनारसी के दुकान पर खड़े सभी सज्जन उस चलचित्र को देख रहे थे जहाँ एक ग़रीब रिक्शावाला यह कहते हुए अपने प्राणों की भीख माँग रहा था कि,

"साहब हमसे गलती हो गई!"
"रिक्शे का चेन उतर गया था इसलिए रिक्शा सड़क के किनारे लगाने में तनिक देर हो गई!"

परन्तु रिक्शेवाले की ये खोखली दलीलें उस ईमानदार पुलिसवाले के समक्ष बौनी साबित हो रही थीं, और क़ानून  के समुचित पालन हेतु वह लगातार उस ग़रीब रिक्शेवाले के ऊपर लाठियों की बौछार करता चला जा रहा था। 

        पनवड़िया बनारसी के सभी गणमान्य ग्राहक मूकदर्शक बने यह नाटक बड़ी ही ईमानदारी और तन्मयता के साथ देख रहे थे! तभी पंडित फुदकूराम यह कहते हुए वहाँ से निकल लिए कि,
"बड़ी देर हो रही है!"
"इस नौटंकी का प्रसारण कोई खास बात नहीं!"   



लेखक : ध्रुव सिंह 'एकलव्य'
    

Tuesday, 14 January 2020

मटमैला पानी ( लघुकथा )



मटमैला पानी ( लघुकथा



"रे सुना है, ऊ कलुआ पंचर वाले ने भी प्रधानी के चुनाव हेतु पर्चा भरा है!"
ठहाका मारके हँसते हुए छगन मिसिर।
रामसजीवन,
"अरे!"
"यह बात तो हमने भी सुनी है!"
छगन मिसिर,
"हाँ..!"
"ठीक ही है!"
"पंचर बनाते-बनाते कहीं गाँव की इज़्ज़त पर ही न पंचर चिपका दे!"

रामसजीवन,
"राम... !"
"राम ...!"
"राम...!"
"अब पंचर वाले भी हमार गाँव चलाने को तैयार हैं!"
"घनघोर कलयुग!"
तभी चमन डाकिया अपनी साईकिल की घंटी बजाता हुआ उन धनाढ्यों की चौपाल पर अपनी हाज़िरी लगाने पहुँचता है जहाँ सभी अलाव के चारों ओर बैठकर सर्दी का भरपूर आनंद ले रहे थे।

छगन मिसिर,
"का हो चमन!"
"कइसे हो ?"
चमन,
"सब ठीक है पंडित जी!"
छगन मिसिर व्यंग्य कसते हुए, 
"आजकल हमरी चौपाल पर तुम्हरा आना-जाना बड़ा कम हो गया है!"
"का सारी चिट्ठी-पाती उहे कलुआ पंचरवाले की झोपड़िया में गिरावत हो का!"

चमन डाकिया,
"अरे नाही पंडित जी!"
"का बात करत हो!"
बात को टालते हुए चमन डाकिया वहाँ से चला जाता है। जल्द ही चमन की साईकिल सड़क के किनारे एक उजाड़-सी मड़ई, ( जहाँ ट्यूब के कुछ टुकड़े, लोहे के गोलाकार बर्तन में भरा मटमैला पानी और पास में ही रखा जंग लगा हवा भरने वाला पम्प जो मड़ई के घास-फूस की दीवार के सहारे टिकाकर रखा गया था।
मड़ई की छत से कुछ पुराने टायर लटक रहे थे मानो किसी साईकिल के पहिए में लगने से पहले ही अपने अंतिम अवस्था की बची चंद घड़ियाँ गिन रहे हों! ) के पास आकर रुकी।

मटमैले लोहे के बर्तन में रखे पानी में एक अधेड़ उम्र का व्यक्ति ट्यूब के एक सिरे से दूसरे सिरे को बार-बार डुबोता और हवा के आवागमन को परखता।
छेद का अनुभव होने पर ट्यूब के उस स्थान को पास ही ज़मीन पर पड़े लकड़ी के टुकड़ों को छेद में घुसेड़ते हुए उन्हें चिन्हित करता।

चमन डाकिया,
"का हो कल्लु!"
"कैसे हो ?"
कल्लु,
"सब ठीक बा डाकिया बाबू!"
चमन डाकिया,
"तुम्हरे चुनाव की तैयारी कैसी चल रही है ?"
कल्लु,
"बस चल रहा है डाकिया बाबू!"
कहते हुए कल्लु मड़ई के एक कोने में रखा लकड़ी का स्टूल चमन के लिए बाहर ले आता है और चमन से बैठने का निवेदन करता है, और स्वयं पुनः जाकर पानी में डूबे हुए ट्यूब को पुनः उलटने-पलटने लगता है।

चमन डाकिया,
"अउर!"
"तोहार चुनाव की तैयारी के लिए कउनो पम्पलेट-वम्पलेट छपवाया ?"

कलुआ एक पल को शांत हो जाता है और उसकी निगाहें संभवतः अपनेआप को उसी बर्तन में रखे मटमैले पानी में तलाशतीं  नज़र आती हैं।


लेखक - ध्रुव सिंह 'एकलव्य'





Monday, 30 December 2019

वैश्या कहीं की ! ( लघुकथा )





वैश्या कहीं की !  ( लघुकथा )


"अरि ओ पहुनिया!"
""करम जली कहीं की!"
"कहाँ मर गई ?"
"पहिले खसम खा गई!"
"अब का हम सबको खायेगी!"
"भतार सीमा पर जान गँवा बैठा, न जाने कउने देश की खातिर!"
"अउरे छोड़ गया ई बवाल हम पर!"
कहती हुई रामबटोही देवी अपनी बहुरिया पहुनिया को दरवाज़े पर बैठे-बैठे चिल्लाती है। 

"का है ?" 
"काहे सुबहे-सुबहे जीना हराम करे पड़ी हो ?"
"चूल्हा जलाती होगी बेचारी!"
"तुमसे तो कउनो काम होता नहीं!"
"अउरे जो कर रहा है, उसका भी करना मुहाल करे रहती हो!"
अँगीठी के पास बैठकर बड़ी ही शिद्दत से अपना चिलम फूँकते हुए छगन महतो अपनी अधेड़ स्त्री को दो टूक सुनाते हैं। 

"हाय-हाय!"
"ई बुढ़वा को सभई दोष हमरे ही किरिया-चरित्तर में दिखता है!"
"अपने बहुरिया की छलकती हुई जवानी में कउनो खोट नाही दिखाई देता तुमका!"
"अरे आजकल ऊ झमना लोहार के लड़िकवा दिन-रात इहे दरवज्जे पर पड़ा रहत है!"
"और तो और, ई छम्मक-छल्लो ओकरी आवाज़ सुनकर दरवज्जे पर बिना घूँघट के मडराने लगती हैं!"
"वैश्या कहीं की!"      
बकबकाती हुई रामबटोही दरवाज़े पर खड़े बैलों को चारा खिलाने लगती है। तभी अचानक एक करुणभरी चीख़ दरवाज़े से होते हुए ओसार तक पहुँचती है। छगन महतो चीख़ सुनकर अपना चिलम छोड़, दौड़े-दौड़े दरवाज़े की तरफ़ आते हैं जहाँ बैलों ने रामबटोही को ज़मीन पर पटक दिया था, और वो बदहवास छितराई पड़ी थी।

"अरे ओ पहुनिया!"
"तनिक दौड़ जल्दी!"
"देख, तुम्हरी सास को बैल ने पटक दिया!"
कहते हुए छगन महतो मंद-मंद मुस्कराते हुए अपनी पत्नी रामबटोही को सहारा देकर दरवाज़े की ड्योढ़ी पर बैठाते हैं तब तक इधर पहुनिया दरवाज़े पर पहुँचते ही रामबटोही के पीठ पर अपना हाथ फेरने लगती है!
उधर छगन महतो ओसार में जाकर अपना चिलम फूँकने लगते हैं और अपना मुँह ओसार की छत की ओर कर धुँआ निकालते हुए मानो जैसे कह रहे हों "शठे शाठ्यम समाचरेत!"

नारी सशक्तिकरण! ( लघुकथा )






नारी सशक्तिकरण! ( लघुकथा )


"रामकली!
"अरी ओ रामकली!"
"पकौड़े ला रही है या बना रही है!"
"ये निठल्ली मुई, एक काम भी समय से नहीं करती है!"
कहती हुई भावना अपनी नौकरानी रामकली पर खीझती है।

"छोड़ यार!"
"इधर मन लगा!"
"देख तू फिर से हार जायेगी!"
"नहीं तो!"
"चल, अपने ताश के पत्ते संभाल!"
कहती हुई भावना की सहेली शिखा ताश के पत्तों को बड़ी ही दक्षता से एक माहिर खिलाड़ी की तरह बाँटती है।

"मेरी अगली चाल सौ की!"
कहते हुए भावना सौ रुपये का नोट टेबल पर पड़े ताश के पत्तों पर दनाक से फेंक देती है।

"क्या यार, कर दी न छोटी बात!"
"अरे, इतने बड़े अफ़सर की बीबी है और तो और नारी सशक्तिकरण मंच की अध्यक्षा भी!"
"और टेबल पर बस सौ रुपये!"
"थोड़ा बड़ा दाँव लगा!"
कहती हुई भावना की सहेली पुष्पा अपने जूड़े को अपने हाथों से समेटने लगती है।

चाय की चुस्की लेते हुए शिखा,
"अरे यार, ये बता!"
"हमारी नारी सशक्तिकरण मंच वाली पार्टी कहाँ तक पहुँची ?"
तिरछी नज़रों से देखते हुए भावना की ओर प्रश्न दागती है।

"कह तो दिया है इनसे कि मल्होत्रा जी का रॉयल पैलेस देख लें और बुक कर दें, अगले रविवार के लिये!"
गहरी साँस लेते हुए भावना उसे तसल्ली देती है।

"अरे, मंच के लिये कोई धाँसू कविता तैयार की है कि नहीं ?"
"पिछली दफा तेरी वो भूखे-नंगों वाली कविता ने तो पूरे महफ़िल में कोहराम मचा दिया था!"
"और वो रेप वाली लघुकथा, उसने तो सबकी आँखों में आँसू ही ला दिये थे!"
शिखा, भावना को दो फुट चने के झाड़ पर चढ़ाते हुए नमक़ीन के कुछ दाने अपनी मुठ्ठी में भर लेती है। तभी रामकली पकौड़ों का प्लेट लेकर रसोईं से टेबल की ओर बढ़ती है।

"अब क्या होंगे तेरे ये पकौड़े ?"
"हमारी चाय तो कब की ठंडी हो गयी!"
"तुझसे एक काम भी ठीक से नहीं होता!"
"चल जा यहाँ से!"
भावना उसे खरी-खोटी सुनाते हुए जाने के लिये कहती है। परन्तु न जाने क्या सोचकर रामकली वहीं उसी टेबल के पास कुछ देर तक बुत बनी खड़ी रहती है।

"अब क्या है?"
"प्लेट रख, और जा यहाँ से!"
"क्यों खड़ी है मेरे सर पे ?"
सर पर हाथ रखते हुए भावना उसे फटकारती है।

"मालकिन, मेरे पोते का मुंडन है आज!"
"सौ रुपये मिल जाते तो!"
संकोच करते हुए रामकली कहती है।

"पैसे क्या तेरे बाप के घर से लाऊँ!"
"अगले महीने दूँगी!"
"काम करना है तो कर!"
"नहीं तो अपना हिसाब कर, और चलती बन!"
कहती हुई भावना, ग़ुस्से से उसे घूरती है। रामकली निरुत्तर-सी कुछ देर वहीं खड़ी रहती है और फिर अपना सर झुकाये वहाँ से चली जाती है।


लेखक : ध्रुव सिंह 'एकलव्य'            
              

दो लघुकथाएँ





छुटकारा ( लघुकथा )


"बोल-बोल रानी! कितना पानी ?
 नदिया सूखी, भागी नानी।" 
कहते हुए ननुआ मदारी अपने बंदर और बंदरिया को अपनी पीठ के चारों ओर घुमाता हुआ, "क़दरदान !  मेहरबान! अपनी झोली खोलकर पैसा दीजिए! भगवान के नाम पर, इन मासूम खिलाड़ी बंदर-बंदरिया की रोज़ी-रोटी के वास्ते! दीजिए! दीजिए!
साहेबान!
निग़हबान!
चलो भईया! आज का खेल यहीं ख़त्म!'' कहते हुए ननुआ मदारी अपना करामाती थैला समेटता है और घर की ओर अपने बंदर-बंदरिया को लेकर चल पड़ता है। घर के दरवाज़े पर पहुँचते ही उसको उसकी माँ की दर्दभरी खाँसी सुनायी देती है और वह जाकर उसके सिरहाने यह कहते हुए बैठ जाता है कि,

''माँ कल थोड़े पैसे और हो जायें तो तुझे अच्छे डॉक्टर को दिखाऊँगा।"  
इधर ननुआ की बंदरिया भी कुछ दिनों से बीमार चल रही थी जिसके सर को उसका बंदर अपनी गोद में रखकर सहला रहा था और ननुआ की अपनी माँ से वार्तालाप भी बड़े ध्यान से सुन रहा था। दूसरे दिन ननुआ यह जानते हुए कि उसकी बंदरिया बहुत बीमार है, दोनों को लेकर खेल दिखाने निकल गया। 
साहेबान!
क़दरदान! 
अब देखिये, मेरा बंदर अपनी बंदरिया को गोली से उड़ा देगा !
''ठाँय-ठाँय !"
बंदरिया ज़मीन पर गिर पड़ी। बंदर ने उसे कफ़न ओढ़ाया । साहेबान!
क़दरदान!
"अब देखिए हमारा बंदर अपनी बंदरिया को कैसे जीवित करता है।''

ननुआ का बंदर अपनी बंदरिया को उठाने के लिये झिंझोड़ने लगा। बंदरिया दोबारा नहीं उठी। संभवतः उसे अपने रोज़-रोज़ के झूठ-मूठ के मरने से सच में छुटकारा मिल चुका था। बंदर वहीं अपनी बंदरिया की लाश के पास बैठा-बैठा आसमान की ओर निःशब्द, निर्निमेष देख रहा था मानो वह अपनी बंदरिया की आत्मा को महसूसकर  मन ही मन कह रहा हो-
"चलो अच्छा हुआ, तुझे कम से कम इस नरक से छुटकारा तो मिला!''



ठेठ पाती ( लघुकथा ) 

"सुनो!
सुनो!
सुनो!"

''सभी गाँव वालों ध्यान से सुनो!"
"विधायक जी ने गाँव की महिलाओं और लड़कियों हेतु एक 'चिट्ठी लिखो प्रतियोगिता' का आयोजन किया है।" "जीतने वाली प्रतिभागी को हमारे विधायक जी स्वयं पंद्रह अगस्त को एक हज़ार रुपये की पुरस्कार राशि से पुरस्कृत करेंगे।"
"सुनो!
सुनो!
सुनो!"
कहते हुए नेताजी का संदेशवाहक अपनी टुटपुँजिया साइकिल अपने बलपूर्वक खींचता हुआ गाँव के बाहर निकल गया। 
"अरे ओ परवतिया!"
"सुनती है!"
"देख गाँव में कउनो खेला होने वाला है।"
"तुम भी काहे नहीं चली जाती!"
कहते हुए परवतिया के ससुर अपना ख़ानदानी हुक़्क़ा गुड़गुड़ाने लगते हैं। 
"ठीक है!"
"सुन लिया!"
"मैं कल पंचायत-भवन में चली जाऊँगी अपना बोरिया-बिस्तर लेकर।"
कहती हुई परवतिया बैलों की नाद में भूसा डालने लगती है। 
दूसरी सुबह परवतिया गाँव के पंचायत-भवन पहुँचती है जहाँ और बाक़ी महिलाएँ आयोजनकर्मियों द्वारा दिये गये काग़ज़ पर कुछ लिखने में व्यस्त थीं। परवतिया कुछ समझ पाती उसके पहले ही एक कर्मी ने उसके हाथों में एक सादा काग़ज़ और क़लम पकड़ाते हुए दूसरे कोने में बैठ जाने का इशारा करता है और कहता है कि-
''देश के विकास के नाम एक पाती लिखो!"
परवतिया कुछ सोचती हुई पंचायत-भवन के एक कोने में जा बैठती है और अपनी टूटी-फूटी भाषा में कुछ लिखने लगती है। 
"पणाम! हम कहे रहे, इहाँ सबहि ठीक बा" 
हऊ केदार राम के गदेलवा विकशवा, मुआं 
कबही से बेमार रहा। कलिया बता रही थी कि, ऊ मुआं झोलाछाप वैद्यवा के कारन विकशवा का तबियत ढेर ख़राब हो गवा रहा!"
"तबही नये वैद के यहाँ ओकरी माई ले गयी रहिन!"
"आज भोरहरी ओकर मृत्यु हो गयी रही!''
"सुनने में आ रहा था कि ई नया वैद दवाई का तनिक बेसी ख़ुराक़ दे दिआ रहा!"
"बाक़ी सबहि कुशल मंगल! हमरी बकरिया छबीली, कलही से पानी नाही गटक रही है!
"बाक़ी खबर आने पर पता लगेगा!"

"तुम्हरे चरनों की धूल!"
परवतिया 

ध्रुव सिंह 'एकलव्य'  


खोखली पंचायत ( लघुकथा )

खोखली पंचायत ( लघुकथा )  "अ रे ए होरी!" "तनिक एक मस्त चाय तो बना!" "ससुर ई मच्छर!" "रातभर कछुआ...